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बिहार विधानसभा में विधायक निधि बढ़ाने को लेकर हंगामा: सत्ता और विपक्ष एकजुट, सदन में देर तक नारेबाजी

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बिहार विधानसभा में सोमवार को एक अप्रत्याशित राजनीतिक दृश्य देखने को मिला। विधायक निधि फंड बढ़ाने के मुद्दे पर सत्ताधारी दलों के विधायकों ने ही नीतीश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सभी सदस्य एक साथ खड़े होकर जोरदार नारेबाजी करने लगे। विरोध के दौरान विपक्ष के कई विधायक भी उनके साथ हो गए, जिससे सदन में हंगामा बढ़ गया और कार्यवाही काफी देर तक बाधित रही।
भाजपा के प्रमोद कुमार ने मौजूदा विधायक निधि को बढ़ाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए यह राशि पर्याप्त नहीं है और इसे बढ़ाया जाना चाहिए। इस पर वित्त मंत्री विजेंद्र यादव ने कहा कि फिलहाल निधि बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। उनके जवाब से असंतुष्ट होकर कई विधायक अपनी सीट से खड़े हो गए और उन्होंने इसे अपने-अपने क्षेत्र के विकास में बाधा बताया।
भाजपा के नीरज बबलू ने भी जोरदार तरीके से निधि बढ़ाने की मांग को दोहराया। मंत्री विजेंद्र यादव ने कहा कि यदि सांसद निधि बढ़ती है तो विधायक निधि पर भी विचार किया जाएगा। इसके जवाब के बाद सत्ता और विपक्ष दोनों ओर के विधायकों ने फिर से एकजुट होकर हंगामा शुरू कर दिया। उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने आश्वासन दिया कि मंत्री इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेंगे और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से चर्चा की जाएगी। इसके बावजूद सदन में काफी देर तक हंगामा चलता रहा।

संपादकीय: विधायक एकजुट,

जनता की समस्याओं पर क्यों नहीं?
इस घटना ने एक महत्वपूर्ण और चिंताजनक सवाल खड़ा किया है। जिस तरह विधायक अपने व्यक्तिगत क्षेत्र और निधि बढ़ाने के लिए पूरी तरह एकजुट हो जाते हैं, काश इसी तरह सत्ता और विपक्ष जनता की आम समस्याओं—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत जरूरतों—के लिए भी एक साथ आवाज उठाते।
सदन में यह हंगामा सिर्फ विधायक निधि तक सीमित नहीं है। यह दर्शाता है कि जब नेताओं को अपनी प्राथमिकताओं का सवाल होता है, तो वे कितनी जल्दी एकजुट होकर नारेबाजी और दबाव बनाने में सक्षम हैं। लेकिन जब वही मुद्दा आमजन के जीवन की जरूरतों का हो, तो अक्सर राजनीतिक रंग और दलगत विरोध बीच में आ जाता है।
अगर सत्ता और विपक्ष मिलकर जनहित के मुद्दों पर एकजुटता दिखाएं, तो लोकतंत्र की ताकत और भी मजबूत होगी। विधायक निधि के लिए सदन में हुई नारेबाजी से साफ संदेश मिलता है कि इच्छाशक्ति और संगठनात्मक क्षमता मौजूद है। अब जरूरत है कि यही ऊर्जा जनता की समस्याओं को हल करने में लगाई जाए।
यह घटना इसलिए भी यादगार है कि यह बताती है कि नीति, पारदर्शिता और विकास कार्यों में सहयोग कितनी अहम भूमिका निभा सकते हैं। जनता के मुद्दे, क्षेत्रीय निधि के सवालों से कहीं बड़े हैं। यदि नेताओं का उद्देश्य केवल खुद के क्षेत्र के फायदे तक सीमित न रहे और जनता के कल्याण के लिए भी इसी तरह एकजुटता दिखाई जाए, तो समाज में विश्वास और लोकतंत्र की गुणवत्ता दोनों मजबूत होंगे।

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